ऐसी कौन सी बीमारी है ? जिसका दर्द करीब 25 मिलियन भारतीय महिलाएं चुपचाप सहती है?
एंडोमेट्रियोसिस एक विकार (autoimmune disorder) है। जिसमें आमतौर पर गर्भाशय के अंदर स्थित ऊतक इसके बाहर बढ़ता हुआ पाया जाता है। यह अंडाशय और फैलोपियन ट्यूब के बीच बढ़े हुए टिश्यू के रुप में दिखाई देता हैं। इस बीमारी से प्रजनन उम्र की 25 मिलियन महिलाएं दर्द से प्रभावित होती है। दुनिया भर में दस में से एक महिला एंडोमेट्रियोसिस से पीड़ित है। साथ ही एंडोमेट्रियोसिस के कारण निःसंतानता होना की सबसे ज्यादा संभावना होती है। एंडोमेट्रियोसिस की समस्या मुख्य रुप से 15 वर्ष से लेकर 45 वर्ष की महिलाओं में सबसे ज्यादा देखने को मिलता है। कुछ महिलाओं का कहना है किएंडोमेट्रियोसिस में ऐसा महसूस होता है कि उनके अंदरूनी हिस्से को नीचे खींचा जा रहा है।
अनियमित पीरियड्स, दर्दनाक पीरियड्स, दर्दनाक संभोग और पेशाब और मल के दौरान दर्द का अनुभव करना, बांझपन और कब्ज, सूजन, मतली आदि एंडोमेट्रियोसिस के लक्षण हैं। आशा आयुर्वेदा केन्द्र की निःसंतानता विशेषज्ञ डॉ चंचल शर्मा कहती है। कि निश्चित रूप से बीमारी के बारे में जागरूकता की कमी है। जिसके कारण आज भी एंडोमेट्रियोसिस से भारत में महिलाओं की इतनी बड़ी आबादी दर्द से परेशान है। पर चिंता की कोई बात नही आयुर्वेद में इस बीमारी का इलाज संभव है।
एंडोमेट्रियोसिस के लक्षण -
कुछ महिलाएं एंडोमेट्रियोसिस के दर्द को “किलर क्रांंप्स” कहती हैं। क्योंकि इस स्थिति में उन्हें बहुत ज्यादा दर्द होता है। एंडोमेट्रियोसिस की बीमारी जैसे-जैसे पुरानी होती है उसका दर्द उतना अधिक होता जाता है। और इसके गंभीर परिणाम स्वरुप निःसंतानता , अनियमित पीरियड्स एवं अन्य प्रजनन संंबंधी परेशानियां देखने को मिलती है।
- पीरियड्स बहुत ज्यादा लंबे और दर्दनाक हो जाते है।
- माहवारी के दौरान माइग्रेन या पीठ के निचले हिस्से में दर्द होता है।
- जब आप पेशाब या फिर शौच करते है उस दौरान भी आपका बहुत ज्यादा दर्द का अहसास होता है।
- मासिक धर्म के बीच योनि से खून बहना।
- आपके मूत्र में या आपके मलाशय से ब्लड निकलना।
- थकान,मतली,दस्त या कब्ज एवं सूजन जैसी परेशानी होना।
- गर्भधारण करने में दिक्कत होना ये सब लक्षण एंडोमेट्रियोसिस के हो सकते हैं।
एंडोमेट्रियोसिस के कारण -
एंडोमेट्रियोसिस के कारणों की सटीक जानकारी अभी तक उपलब्ध नही है। परंतु कुछ ऐसे मुख्य कारण है जो एंडोमेट्रियोसिस की वजह बनते है।
- जब महिलाओं में रेट्रोग्रेड मेंस्ट्रुएशन (Retrograde menstruation) चलने लगता है। रेट्रोग्रेड मेंस्ट्रुएशन का मतलब है कि महिला का मासिक धर्म सही दिशा में नही चलता है। ज्यादातर महिलाएं इसका अनुभव करती हैं, लेकिन अगर यह गंभीर है, तो यह दर्द का कारण बनती है और एंडोमेट्रियोसिस की समस्या हो जाती है। आमतौर पर मासिक धर्म चक्र के दौरान ब्लड में एंडोमेट्रियल टिश्यू महिला शरीर से बाहर हो जाते है। परंतु यदि यह रक्त से साथ बाहर नही हुए तो यह फैलोपियन ट्यूब में केविटी के रुप में चिपक जाते है । यह एंडोमेट्रियल टिश्यू प्रजनन अंगों में चिपक जाते है और गंभीर दर्द के साथ एंडोमेट्रियोसिस का कारण बनते है।
- जब किसी महिला की पेरिटोनियल सेल में बदलाव होता है। तो इससे एंडोमेट्रियोसिस होने की अधिक संभावना होती है। इस अवस्था को induction theory भी कहा जाता है। ऐसे में एस्ट्रोजन हार्मोन भ्रूण की स्थिति में बदलाव कर सकते है।
- जब कोई महिला सर्जरी कराती है। तो इससे भी एंडोमेट्रियोसिस होने की संभावना होती है।
- आयुर्वेद के अनुसार एंडोमेट्रियोसिस की सबसे बड़ी वजह कमजोर इम्यूनिटी होती है। क्योंकि जिन महिलाओं की रोगप्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, उनके एंडोमेट्रियल ऊतक जल्द से प्रभावित हो जाते है।
एंडोमेट्रियोसिस का आयुर्वेदिक उपचार - endometriosis ka ayurvedic upchar in Hindi
आयुर्वेद चिकित्सा के अनुसार महिलाओं में एंडोमेट्रियोसिस होने की संभावना एस्ट्रोजन हार्मोन के स्तर में वृद्धि होने के कारण बढ़ती है। ऐसे में आयुर्वेद में ऐसी डाइट एवं लाइफ स्टाइल को प्रीफर किया जाया है। जो एंडोमेट्रियल सिल्स को बढ़ने से रोके और शारीरिक दोषों को संतुलित करे।
मासिक धर्म चक्र के समय यूट्रस की लाइनिंग मोटी हो जाती है और एस्ट्रोजन का लेवल भी बढ़ जाता है। ऐसे मेें आयुर्वेदिक हर्बल औषधियों की मदद से इस लेवल को कम करके एंडोमेट्रियोसिस की समस्या से निजात पाई जाती है। एंडोमेट्रियोसिस की स्थिति यदि बहुत ज्यादा खराब हो गई है तो ऐसे में तुरंत डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए।
- नियमित रुप से व्यायाम करके एंडोमेट्रियोसिस एवं एस्ट्रोजन के लेवल को कम किया जा सकता है।
- जब किसी महिला में एस्ट्रोजन का स्तर बढ़ जाता है तो उसमें मोटाप की संभावना भी बढ़ जाती है। ऐसे में चाय एवं कॉफी पीना बंद कर दें या फिर कम कर दें।
- डाइट एवं लाइफ स्टाइल का पूरा ध्यान रखें।
- डाइट में फाइबर एवं प्रोटीन को प्रमुखता से जगह दें।
- धूम्रपान एवं नशीले पदार्थों से पूरी तरह दूर रहें।
